Dushyant Kumar: Biography And Best Poetry
”मत कहो की आकाश में कुहरा घना है, ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना हैं.” ये कविता है साये में धूप के बेहतरीन लेखक दुष्यंत कुमार की. जिन्हें हिंदी साहित्य में ‘समय का शायर’ के नाम से जाना गया. दुष्यंत कुमार ने अपने हिंदी ग़ज़लों के माध्यम से जीवन और सियासत के हर के पहलु पर कविताएं और ग़ज़लें लिखी. उनके द्वारा लिखें गए हर एक अशआर आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितना कि दुष्यंत कुमार का जीवन काल और उन का संघर्ष. दुष्यंत कुमार को उनकी ग़ज़लों और बेबाक लिखावट ने हिंदी साहित्य का राजकुमार बना दिया.
दुष्यंत कुमार का जन्म 1 सितम्बर 1933 में उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के राजपुर नवादा गाँव में हुआ था. इनका पूरा नाम दुष्यंत कुमार त्यागी था. इनके पिता का नाम चौधरी भगवत सहाय और माँ का नाम रामकिशोरी था. दुष्यंत कुमार का विवाह साल 1949 में राजेश्वरी से हुआ था. उस समय इनकी उम्र महज 18 साल थी जबकि इनकी पत्नी इनसे दो साल छोटी और कम पढ़ी लिखी थी. जिनका भी दाखिला बाद में इनके पिता ने स्कूल में कर दिया. साल 1954 में ये इलाहबाद आगे की पढ़ाई करने के लिए आये. इसके बाद इनकी पत्नी भी साथ आ कर रहने लगी.
दुष्यंत कुमार को संघर्ष के समय में हिंदी जगत के मशहूर लेखक डॉ हरिवंश राय बच्चन का साथ मिला और उन्हीं की बदौलत उन्हें आकाशवाणी में स्क्रिप्ट राइटर की जॉब मिली थी. उस समय दिल्ली में आकाशवाणी में बतौर स्क्रिप्ट राइटर काम करने का इन्हें 250 रुपए प्रति माह मिलता हैं. बाद उन्होंने हिंदी एक और प्रतिष्ठित कवी पंडित भवानी प्रसाद मिश्र के साथ मिलकर दिल्ली के करोल बाग़ इलाके में एक घर किराये पर ले लिया. इसके बाद इन दोनों को हिंदी बेहतरीन लेखक मोहन राकेश और कमलेश्वर भी शामिल हो गए. इसके बाद इनकी चौकड़ी ने खूब कमाल किया.
दुष्यंत का तबादला बाद में भोपाल में हो गई और तब से वो भोपाल में ही रहे. दुष्यंत को भोपाल दिल्ली से ज्यादा पसंद आया क्योंकि वहां पर रहने के लिए सस्ती और किफायती जगह थी और वहां दिल्ली जैसी भीड़ भी नहीं थी. दुष्यंत को भोपाल से बहुत लगाव था और वो अपनी अंतिम सांस तक भोपाल में ही रहे. सारे उपन्यास और कविताएं उन्होंने भोपाल में नहीं लिखी. या यूँ कहें की भोपाल का ज़िक्र किये बिना दुष्यंत का सम्पूर्ण वृत्तंत अधूरा रहेगा. इन परिवार आज भी दुष्यंत की यादें समेटे भोपाल में ही रहता हैं. इनके दो बेटे और एक बेटी थी जो की अब इस दुनिया में नहीं हैं. एक बेटा सेना में है और दूसरा बैंक में काम करता हैं.

कहानी, समीक्षा से ही उनकी पहचान शब्दों से हुई और अपने शुरूआती दौर में दुष्यंत परदेशी के नाम से लिखा करते थे. जब वो आठवीं में थे तब पहली कहानी लिखी थी आघात. जिसको आधार बनाकर इन्होने बाद में एक उपन्यास भी लिखा. जिसका नाम था आंगन में एक वृक्ष. लेकिन दुष्यंत को सबसे ज्यादा मकबूलियत हासिल हुई कविताओं से. उनकी कविताओं ने युवाओं के अंदर एक अलग आग फूंक दी. उनकी हर एक कविता कई सारे जज्बातों को समेटे हुए हैं. जिससे क्रांति की लौ धधकती दिखाई देती हैं. उनकी सबसे चर्चित कविता है की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार है…
“हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए.
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए.
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए.
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए.”
दुष्यंत कुमार आम लोगों के लेखक थे. वो आम जनता की दुःख और तकलीफों को अपने कलम के जरिए पन्नों पर उतार देते हैं. साये में धूप के उनकी सबसे बेहतरीन काव्य संग्रह मानी जाती हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि इस किताब में आम जीवन से जुड़े हर एक पहलु को समेटे हुए है. दुष्यंत कुमार इस किताब के माध्यम से क्रांति लिखते. वो क्रांति जो समय के साथ आम लोगों के दिल में तो था लेकिन उसे आवाज़ नहीं मिल रही थी. तब दुष्यंत ने लिखा ”साये ने धूप के” इस किताब के कुछ शेर इस प्रकार है कि…….
पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं
कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं
30 दिसंबर 1975 को महज 42 साल के कम उम्र में उनका निधन हो गया था. इतनी कम उम्र में भी दुष्यंत ने हिंदी साहित्य में अपना अमिट छाप छोड़ने में कामयाब रहे. दिसंबर की इस सर्द रात में दुष्यंत अपने एक दोस्त के घर दावत पर गए थे. रात में देर तक शायरी कली महफ़िल भी जमी और देर में घर में आ कर वो सो गए. रात के तीसरे पहर को सीने में दर्द उठा और दुष्यंत बिना किसी बेहतरीन इलाज़ के उसी रात को इस दुनिया को अलविदा कह गए. किसी से न हारने वाले दुष्यंत उस रात अपने उस दर्द से हार गए. आज दुष्यंत को इस दुनिया से गए तकरीबन 46 साल हो गए लेकिन उनके ग़ज़लें आज भी आने वाली पीढ़ियां गुनगुनाती हैं.
यहाँ तक आये है तो दुष्यंत कुमार के ये दो बेहतरीन ग़ज़लें जरूर पढ़कर जाइएगा…. (Dushyant Kumar: Best Poetry)
मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ
एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ
तू किसी रेल-सी गुज़रती है
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ
हर तरफ़ ऐतराज़ होता है
मैं अगर रौशनी में आता हूँ
एक बाज़ू उखड़ गया जबसे
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ
मैं तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने क़रीब पाता हूँ
कौन ये फ़ासला निभाएगा
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ
कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये
यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये
न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये
ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये
वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये
जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिये.
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